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संत शिरोमणि श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज

संत शिरोमणि श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज

Published by: ICR Updated Mon, 07 Sep 2026 05:39 PM IST
संत शिरोमणि श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज
"जब-जब समाज में वैमनस्य, संकीर्णता और अंधकार बढ़ता है, तब-तब इस पावन धरा पर ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण होता है जो अपने तपोबल, संगठन शक्ति और करुणा से मानवता को नई दिशा प्रदान करती हैं।"

संत शिरोमणि श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज: वो दिव्य विभूति जिन्होंने स्थापित की 'अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद' एवं 'त्रिकाल अखाड़ा महासंघ'

✍️ संपादन: आध्यात्मिक चेतना डेस्क | ⏱️ पढ़ने का समय: 8 मिनट | 📅 विशेष पावन आलेख

"जब-जब समाज में वैमनस्य, संकीर्णता और अंधकार बढ़ता है, तब-तब इस पावन धरा पर ऐसी दिव्य विभूतियों का अवतरण होता है जो अपने तपोबल, संगठन शक्ति और करुणा से मानवता को नई दिशा प्रदान करती हैं।"

भारतीय संत परंपरा सदा से ही धर्म-रक्षा, लोक-कल्याण और आत्मा के उत्थान की संवाहक रही है। जिस प्रकार भक्तिकाल में संत कबीर, गुरु नानक देव और गोस्वामी तुलसीदास जी ने रूढ़ियों को तोड़कर प्रेम, भक्ति और मानवता का मार्ग दिखाया, ठीक उसी परंपरा को आधुनिक युग में आगे बढ़ा रहे हैं—**परम पूज्य प्रातः स्मरणीय श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज**।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में संतों की महिमा का गुणगान करते हुए लिखा है:

"संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहइ न जाना॥
निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवै सुसंत पुनीता॥"
(भावार्थ: संतों का हृदय मक्खन के समान कोमल होता है। मक्खन तो खुद को आंच लगने पर पिघलता है, लेकिन सच्चे संत दूसरों के दुःख-दर्द को देखकर ही द्रवित हो उठते हैं।)

पूज्य सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज का संपूर्ण जीवन इसी चौपाई का सजीव प्रमाण है। उन्होंने न केवल वैश्विक स्तर पर मानवता को जोड़ने के लिए **'अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद'** का गठन किया, बल्कि सनातन संस्कृति, संत समाज के सशक्तिकरण एवं अखाड़ा परंपरा के संरक्षण हेतु **'त्रिकाल अखाड़ा महासंघ'** की भी ऐतिहासिक स्थापना की। आइए, इस विशेष ब्लॉग में उनके पावन जीवन, साधना और दोनों महान संस्थाओं के संकल्प को विस्तार से जानें।

📌 त्वरित परिचय: पूज्य महाराज श्री एक नज़र में

प्रमुख बिंदु

पावन विवरण

नाम / पावन पदवी

परम पूज्य श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज

आध्यात्मिक परंपरा

सनातन संन्यास परंपरा (दशनामी जूना अखाड़ा / गिरि शाखा)

संस्थापक

१. अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद (International Inter-Religious Council)
२. त्रिकाल अखाड़ा महासंघ (Trikal Akhada Mahasangh)

मूल जीवन दर्शन

वसुधैव कुटुम्बकम्, सनातन धर्म-रक्षा, सर्वधर्म समभाव एवं नर सेवा ही नारायण सेवा

प्रमुख अभियान

धार्मिक संवाद, संत समन्वय, गंगा-यमुना स्वच्छता, गौ-संरक्षण, व्यसनमुक्ति व निःशुल्क अन्नक्षेत्र

अमर संदेश

"ईश्वर एक है, सत्य एक है; मार्ग भले भिन्न हों, मंजिल केवल धर्म-रक्षा और मानवता का कल्याण है।"

🌱 १. बाल्यकाल और वैराग्य: जब बचपन में ही जाग उठी आत्म-चेतना

महान संतों के लक्षण बचपन से ही प्रकट होने लगते हैं। पूज्य महाराज श्री का बाल्यकाल सामान्य बालकों की तरह सांसारिक खेलों में नहीं, बल्कि शांत चिंतन, ईश्वर-स्मरण और सेवा-भाव में बीता। अत्यंत अल्पायु में ही उनके कोमल हृदय में संसार की क्षणभंगुरता को देखकर गहरा वैराग्य भाव जागृत हो गया।

माता-पिता व गुरुजनों के प्रति अनन्य श्रद्धा रखते हुए उन्होंने वेदों, उपनिषदों, गीता और संत-साहित्य का गहन अध्ययन किया। निर्धनों, असहायों और मूक पशु-पक्षियों के प्रति उनकी करुणा देखकर हर कोई समझ गया था कि यह बालक आगे चलकर मानवता के कल्याण और धर्म-संस्कृति के उत्थान का महानायक बनेगा।

🏔️ २. गुरु-कृपा, हिमालयी तपस्या और संन्यास दीक्षा

कहा गया है—*'गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।'* आत्म-साक्षात्कार की तीव्र अभिलाषा पूज्य महाराज श्री को संन्यास के मार्ग पर ले गई। उन्होंने विधि-विधानपूर्वक सनातन संन्यास दीक्षा ग्रहण की और दशनामी गिरि परंपरा के गौरव को अलंकृत किया।

हिमालय की एकांत गुफाओं, पवित्र नदियों के तटों और पावन तीर्थों में उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या, मौन साधना और ध्यान का अभ्यास किया। इस साधना ने उन्हें आत्मिक शांति और वो असीम आध्यात्मिक ऊर्जा दी, जिसे उन्होंने व्यक्तिगत मोक्ष के स्थान पर समाज के नव-निर्माण और संत समाज को संगठित करने में समर्पित कर दिया।

🕊️ ३. 'अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद' की स्थापना क्यों की गई? (मूल कारण एवं उद्देश्य)

अक्सर लोग पूछते हैं कि जब देश में अनेक संस्थाएं थीं, तब पूज्य महाराज श्री ने **अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद** की नींव क्यों रखी? इसका उत्तर उनके उस व्यापक दृष्टिकोण में छिपा है जो धर्म को जोड़ने का माध्यम मानता है, तोड़ने का नहीं।

आज की दुनिया मजहबी कट्टरता, जातिवाद, संकीर्ण मानसिकता और वैचारिक हिंसा की आग में झुलस रही है। महाराज श्री ने अनुभव किया कि यदि समय रहते धर्मों के बीच संवाद का सेतु नहीं बनाया गया, तो नफरत मानवता को लील जाएगी। इसी चिंता और करुणा से इस परिषद का जन्म हुआ।

🎯 परिषद के ५ प्रमुख युगांतरकारी स्तंभ:

१. सर्वधर्म संवाद एवं सद्भाव:

हिंदू, इस्लाम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी आदि सभी धर्मों के विद्वानों व गुरुओं को एक मंच पर लाकर पारस्परिक भ्रांतियों को दूर करना और प्रेम का वातावरण बनाना।

२. 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का वैश्विक प्रसार:

पूरी वसुंधरा को एक परिवार मानते हुए युद्ध और नफरत के खिलाफ शांति, सहिष्णुता और भाईचारे की अलख जगाना।

३. 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का व्यावहारिक रूप:

बिना किसी भेदभाव के भूखों को भोजन, बीमारों को दवा, अनाथों को आश्रय और निर्धन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना।

४. प्रकृति, नदियां और गौ-संरक्षण:

पर्यावरण रक्षा को आध्यात्मिक कर्तव्य बनाना—गंगा-यमुना की निर्मलता, व्यापक पौधरोपण और निराश्रित गौवंश की रक्षा हेतु गौशालाओं का संचालन।

५. युवा शक्ति का नैतिक उत्थान:

पाश्चात्य अंधानुकरण और नशे के दलदल में फंस रही युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कारों, योग और स्वावलंबन से जोड़ना।

🚩 ४. 'त्रिकाल अखाड़ा महासंघ' की स्थापना: संत शक्ति और सनातन परंपरा का नवजागरण

पूज्य श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज ने जहां एक ओर वैश्विक सद्भाव के लिए सर्वधर्म परिषद की स्थापना की, वहीं दूसरी ओर सनातन संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने एवं संत-महात्माओं, साधु-संन्यासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए **'त्रिकाल अखाड़ा महासंघ'** की ऐतिहासिक स्थापना की।

त्रिकाल अखाड़ा महासंघ की स्थापना के मुख्य उद्देश्य एवं आवश्यकता:

अखाड़ा परंपरा का संरक्षण व संवर्धन: आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित सनातन अखाड़ा परंपरा के प्राचीन गौरव, अनुशासन और शस्त्र-शास्त्र की मर्यादा को अक्षुण्ण बनाए रखना।
संत समाज की एकता एवं सशक्तिकरण: विभिन्न अखाड़ों, पीठों और परंपराओं के साधु-संतों के बीच समन्वय स्थापित कर उनके अधिकारों व कल्याण की रक्षा करना।
सनातन धर्म एवं संस्कृति की रक्षा: कुंभ, अर्धकुंभ और अन्य पावन पर्वों पर आध्यात्मिक व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना तथा सनातन मूल्यों पर होने वाले आघातों का वैचारिक व संगठनात्मक उत्तर देना।
तीर्थ क्षेत्रों व मठ-मंदिरों का उद्धार: प्राचीन तीर्थों, आश्रमों और मंदिरों के संरक्षण के साथ-साथ वहां जन-कल्याणकारी प्रकल्पों को गति देना।

🤝 ५. धरातल पर सेवा: दोनों संस्थाओं के माध्यम से संचालित जनकल्याणकारी प्रकल्प

पूज्य महाराज श्री केवल उपदेश देने वाले संत नहीं हैं, बल्कि वे कर्मयोग के साक्षात अवतार हैं। अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद और त्रिकाल अखाड़ा महासंघ के तत्वावधान में निरंतर युगांतरकारी कार्य संपादित हो रहे हैं:

सर्वधर्म विश्व शांति सम्मेलन एवं धर्म संसद: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धर्मगुरुओं व संत समाज के ऐतिहासिक सम्मेलनों का सफल आयोजन।
अखंड अन्नक्षेत्र एवं स्वास्थ्य शिविर: आपदाओं, कुंभ मेलों और सामान्य दिनों में भी निर्धनों हेतु 24x7 लंगर-भंडारे व निःशुल्क चिकित्सा परामर्श।
नशामुक्ति जन-जागरण रथ: सैकड़ों गांवों व कस्बों में युवाओं को व्यसन त्यागने और स्वस्थ व संस्कारित जीवन अपनाने का पावन संकल्प।
हरित धरा एवं गौ-संरक्षण अभियान: हजारों फलदार-छायादार वृक्षों का रोपण एवं निराश्रित गौवंश की रक्षा हेतु आदर्श गौशालाओं की स्थापना।

💬 ६. महाराज श्री के अनमोल वचन (अमृत विचार)

"धर्म वह प्रकाश है जो अंतर्मन के अज्ञान को मिटाता है। यदि किसी का धर्म दूसरों से घृणा करना सिखाए, तो समझ लेना वह धर्म नहीं बल्कि विकृति है।"

"संत शक्ति और शास्त्र की मर्यादा ही समाज की असली ढाल है। जब तक संत जागृत हैं, राष्ट्र और धर्म की पताका सदा लहराती रहेगी।"

"सच्ची पूजा केवल मंदिर, मस्जिद या चर्च जाने में नहीं, बल्कि किसी रोते हुए असहाय के आंसू पोंछने और धर्म की रक्षा में तत्पर रहने में है।"

✨ ७. निष्कर्ष: आज के युग में महाराज श्री के संकल्पों की प्रासंगिकता

आज 21वीं सदी में जहां विश्व को शांति और प्रेम के लिए **'अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म परिषद'** जैसे वैश्विक मंच की आवश्यकता है, वहीं अपनी सांस्कृतिक जड़ों और संत परंपरा की रक्षा हेतु **'त्रिकाल अखाड़ा महासंघ'** जैसी सशक्त संस्था का मार्गदर्शन अनिवार्य है।

परम पूज्य श्री श्री 1008 सुनिलेश्वर गिरि जी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि महानता पदों या वैभव में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा, धर्म-रक्षा, सत्य और प्रेम में निहित है। आइए, हम सब मिलकर उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें और एक सशक्त व सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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